Tuesday, March 27, 2012


भंवर मेघवंशी
दलितों पर अत्याचार के ऐसे कई मामले राजस्थान में अक्सर उजागर होते रहते है, जहां पर कृषि के काम में आने वाले टेªक्टर दलितों को कुचलने व रोंदने के काम आ रहे है, पाली जिले की जैतारण तहसील के बेडकलां गांव के जागरूक अम्बेडकरवादी कार्यकर्ता मोहन मेघवाल की शहादत को हम नहीं भूले है, उसे गांव के ठाकुर की मर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ने की सजा गांव के चैराहे पर सरेआम चाकुओं से गोंद कर मार कर दी गई तथा उसकी लाश को टेªक्टर से रोंदा गया। बाड़मेर में खेजड़याली गांव के भील परिवार पर वहां के सांमतों द्वारा टेªक्टर चढ़ाकर माने को प्रयास किया गया। ब्रजक्षेत्र में मजदूरी मांगने पर एक गुर्जर सरपंच ने लक्ष्मण सिंह को बांधकर घसीटा, जिससे उसके दोनों पांव कटवाने पड़े, ऐसी अनगिनत घटनाएं है जहां कृषि तकनीक के ये यंत्र एग्रीकल्चर के काम नहीं बल्कि दलितों पर चढ़ज्ञने के काम आ रहे है। अपेक्षाकृत विकसित माने जा रहे सीकर में भी एक दलित व्यवसायी को मारा पीटा गया है और उसके पिता को बोलेरो से कुचल कर मारने की कोशिश की गई है।
अत्याचार और दलित दमन की खबरें विगत दो सालों से राजस्थान के शेखावाटी अंचल से भी आ रही है। शेखावाटी अंचल जिसमें सीकर, झुंझनू तथा चुरू जैसे उन्नत व विकसित माने जाने वाले जिले आते है, शिक्षा, सम्पन्नता और सामाजिक समता के मामलों में पूरे राजस्थान में इस इलाके की मिसाल दी जाती है, कहा जाता है कि यही अकेला इलाका है जहां पर सभी समुदायों ने कई दशकों पहले मृत्युभोज, बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराईयों पर विजय पा ली थी और छुआछूत व भेदभाव तथा दलित उत्पीड़न जैसे मामले इस क्षेत्र में नही ंके बराबर है मगर सीकर में पिछले साल जो घटना घटित हुई उससे तो लगता है कि अब शेखावटी भी दलित अत्याचार के मामलों में राजस्थान के अन्य अंचलों से होड़ करने को तैयार है। घटनाक्रम के मुताबिक-‘‘सीकर जिले का दातारामगढ़ क्षेत्र के सुरेरा गांव के निवासी दलित व्यवसायी भंवरलाल मेघवाल की इलेक्ट्रोनिक्स की दूकान के बाहर 29 जुलाई 2011 को दोपहर तकरीबन डेढ़ बजे एक बोलेरो आकर रूकी, जिसमें से निकटवर्ती रघुनाथपुरा, निवासी गोपाल गुर्जर व विरमाराम गुर्जर तथा उनके गुर्जर ने दलित व्यवसायी, भंवरलाल मेघवाल से रिमोट और दो सेल मांगे तथा भंवर मेघवाल को जातिगत गांलिया देने लगे, यह कहकर मारपीट शुरू कर दी-साले, नीच, तूने दुकान कैसे कर ली ? उन्होंने लूटपाट भी की, गल्ले में रखे 18 हजार भी निकाल लिये। उन्हें तो बहाना चाहिये था, कुल मिलाकर दलित व्यवसायी की आर्थिक व सामाजिक रूप से कमर तोड़नी थी। इतना ही नहीं, दरिदंगी की हद तो यह हुई कि भंवरलाल मेघवाल को बचाने आये उनके पिता ईश्वर मेघवाल पर भी हमला किया गया, उन्हें जीप से टक्कर लगाकर मारने की कोशिश की गई। ईश्वर मेघवाल ने हिम्मत करके बोलेरो जीप के बम्पर को पकड़ लिया और बोनट पर चढ़ गये, नही ंतो मार डाले जाते। इसके बाद गोपाल गुर्जर व अन्य आरोपी ईश्वर लाल को बोनट पर बांध कर 35 किलोमीटर दूर मोतीपुरा गांव में नेमाराम मावलिया के खेत में ले गये तथा गले में रस्सी का फंदा लगाकर गला घोंटने लगे। अपने पिता के अपहरण और अचानक हुये इस हमले से सन्न दलित व्यवसायी ने पुलिस को खबर की और अन्य  ग्रामीणों को भी अपने साथ हुई हिसंा व पिता के अपहरण की जानकारी दी, आक्रोशित ग्रामीण और पुलिस ढूंढते हुये पहुंची। वहां ईश्वर मेघवाल के गले में फांसी लगाई हुई थी, लेकिन वह जिन्दा था। पुलिस व ग्रामीणों ने ईश्वर मेघवाल को मुक्त करवाया। घटना के विरोध में दातारामगढ़ क्षेत्र के जागरूक दलितों ने थाने के बाहर प्रदर्शन कर कार्यवाही की मांग की है। आरोपी इससे पहले 2008 में अपने ही गांव रघुनाथपुरा के महावीर प्रसाद बावरिया नामक दलित को भी ट्रेक्टर के पीछे बांध कर घसीटने का दुस्साहस कर चुके थे, जिसकी थाने बकायदा रिपोर्ट दर्ज है।
हालात यह है कि कहीं मोटरसाईकिल के बांधकर घसीटे जाते है दलित, कभी जीप, कारों से कुचले जाते है तो कभी टेªक्टर से रौंद दिये जाते है, जैसे कि राजस्थान के दलित इंसान नहीं बल्कि कीडे़ मकौड़े है, जिन्हें कभी भी, कहीं भी मसल कर खत्म किया जा सकता है। भले ही शेखावाटी क्षेत्र में शिक्षा व समृद्धि बढ़ी है, गांव गांव तक तकनीक फैली है मगर लोगों की मानसिकता में अभी बदलाव नहीं आया है, पहले घोड़ो व हाथियों से रौंदें जाते थे दलित और आज वे टेªक्टर, कार, ट्रक व बोलेरो से रौंदे जा रहे है।
राजस्थान में आज भी हालात इतने बदतर है कि दलित दुकान नहीं लगा सकते है, वे नौकरी कर लेते है और पदौन्नती पाते है तो उसमें आरक्षण राजस्थान के गैर दलितों को बर्दाश्त नहीं है, अच्छे कपड़े पहनते है तो पिटते है, अपने ही घर के बाहर खटिया पर बैठ जाये तो गांव से निष्कासित होते है, अपने बच्चों के सुन्दर नाम रख लेने पर पाली जिले के जाडन के चुन्नीलाल की तरह उन्हें भी मारा जा सकता है, उनके अच्छे घर उनके लिये आफत बन सकते है, कई दलित लाशें अपने लिये श्मशान ढंूढती घूम रही है और ज्यादातर दलित जिन्दा होते हुये भी लाशों की तरह जीवन यापन को मजबूर है, इन्हें आज और अभी, सामाजिक न्याय की दरकार है, इनकी सुनवाई हो, सुनी गई बात पर कार्यवाही हो तथा शिकायत करने पर सुरक्षा हो तभी राजस्थान का दलित सिर उठाकर स्वाभिमान से जी पायेगा अन्यथा हर क्षण, हर पला, हर तरह से वह कुचला ही जाता रहेगा।

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