Friday, March 30, 2012


अपने अधिकार से वंचित क्यों हैं आदिवासी

कानून में आदिवासियों के भूमि-अधिकारों की रक्षा की कई व्यवस्थाएं हैं, पर इन सबका उल्लंघन करते हुए बड़े पैमाने पर आदिवासियों की जमीनें छिन रही हैं. भूमि हथियाने वाले अनेक भू-माफिया सक्रिय हैं, जो राजनीतिक व आर्थिक स्तर पर बहुत शक्तिशाली हैं. इसके अतिरिक्त कहीं राष्ट्रीय पार्क, कहीं खनन तो कहीं उद्योग, कहीं शहरीकरण तो कहीं हाईवे व कहीं बड़े बांधों के नाम पर आदिवासियों की जमीनें छिन रही हैं. भू-माफियाओं को पहले ही पता चल जाता है कि कहां हाईवे आदि बनने वाले हैं, वे पहले ही सस्ते दाम पर आदिवासियों की जमीन हथियाने के लिए सक्रिय हो जाते हैं.
कानूनों के उल्लंघन के लिए कई हथकंडे अपनाए जाते हैं. आदिवासियों के नाम पर भूमि खनन के लिए प्राप्त की जाती है. पर वास्तविक खनन बाहर के बड़े सेठ करते हैं. कुछ स्थानों पर बाहरी व्यक्ति आदिवासी युवतियों से विवाह केवल भूमि हथियाने के मकसद से करते हैं. अभ्यारण्य क्षेत्रों में आदिवासी हक पहले भी सीमित किए गए पर अब कुंभलगढ़ में अभ्यारण्य के स्थान पर राष्ट्रीय पार्क बनने से उनकी स्थिति और विकट हो रही है. इस राष्ट्रीय पार्क क्षेत्र में उदयपुर के 23, राजसमंद के 64 व पाली जिले के 41 यानी कुल 128 गांव आ रहे हैं. इस तरह बड़े पैमाने पर विस्थापन का नया खतरा उत्पन्न हो रहा है. जबकि पहले से बने अभ्यारण्यों के निकटवर्ती इलाकों में बाहरी लोग आकर जमीन हथिया रहे हैं. 
सरकार ने आदिवासियों को जमीन पर कब्जा दिलवाने के लिए अभियान चलाए हैं, पर प्रायः मौके पर कब्जा दिलवाया नहीं जाता. मात्र कागज ही दे दिए जाते हैं या सीमा ज्ञान करवा दिया जाता है. जबकि जरूरत इस बात की है कि आदिवासी किसान वास्तव में जमीन पर कब्जा कर उसे जोतना शुरू करे तथा साथ ही उन्हें लघु सिंचाई भी उपलब्ध हो. वर्ष 2006 में आदिवासी वन-अधिकार कानून पास होने पर जो बड़ी उम्मीदें जगी थीं वे सही क्रियान्वयन के अभाव में अब धूमिल होती जा रही हैं. इसकी एक बड़ी वजह यह है कि बहुत से आदिवासियों व अन्य परंपरागत वनवासियों के जायज दावों को भी खारिज कर दिया गया. इस तरह के निर्णय के विरुद्ध यह परिवार समय पर अपील भी नहीं कर सके, क्योंकि उन्हें दावा स्वीकार न करने की सूचना ही नहीं दी गई. 
जो दावे स्वीकार हुए माने गए हैं, उनमें से भी अधिकांश में प्रायः स्वीकृति आधी-अधूरी दी गई है. यदि कोई आदिवासी परिवार पहले पांच बीघा पर खेती कर रहा था व अब उसकी एक बीघा की मान्यता स्वीकार की जाती है तो इसका अर्थ यह है कि चार बीघे से तो उसे हटना पड़ेगा. यदि वह नहीं हटेगा तो फिर पहले जैसी स्थिति ही बन जाएगी कि उसके कब्जे को अवैध माना जाएगा, प्रतिड़ित किया जाएगा या रिश्वत ली जाएगी. आदिवासियों से अलग जो अन्य परंपरागत वनवासी चिन्हित हुए हैं उनके दावे तो लगभग पूरी तरह अस्वीकृत हो रह हैं. कुछ जिलों में अधिकांश दावे अस्वीकृत हो गए हैं. सामूहिक हकदारी संबंधी लगभग सारे दावे अस्वीकृत हो गए हैं. पहले जहां मवेशियों, पशु-पालकों के पशुओं को रहने-चरने का स्थान मिल जाता था अब उन स्थानों पर वन विभाग दीवार बनाकर सामूहिक हकदारी को समाप्त कर रहा है. 
प्रायः कानून की मूल भावना का उल्लंघन हो रहा है. ग्राम सभा को अपेक्षाकृत कम महत्व दिया जा रहा है. जनजातीय विभाग की अपेक्षा वन विभाग अधिक हावी हो गया है. जबकि कानून में वन विभाग को निर्णायक भूमिका नहीं दी गई है. सवाल यह है कि जिस कानून से आदिवासी व वन वासी समुदायों को अपनी किसानी सुधारने की बड़ी उम्मीद थी, यदि उसके अनुचित क्रियान्वयन से अनेक परिवारों व समुदायों की स्थिति और बिगड़ जाए तो इससे आदिवासियों में असंतोष कितना बढ़ सकता है. अतः यह बहुत जरूरी है कि आदिवासियों के भूमि अधिकारों व आजीविका रक्षा संबंधी अन्य कानूनों का मजबूती से पालन किया जाए. जैसा कि हाल में आयोजित एक जन सुनवाई में कई वक्ताओं ने कहा कि यदि मौजूदा कानूनों को ही उनकी सही भावना के अनुकूल लागू कर दिया जाए तो इससे आदिवासियों के भूमि अधिकारों व आजीविका की रक्षा काफी हद तक हो सकती है.
साभारः दैनिक भास्कर

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