Friday, March 30, 2012


कीजिए दलित मुक्ति और होइए मालामाल

भारत में जातिप्रथा के खिलाफ दलित आन्दोलन का एक लम्बा इतिहास रहा है. ज्योतिबा फुले जैसे समाज सुधारकों से लेकर रामास्वामी पेरियार और डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे सामाजिक, राजनीतिक सुधारकों तक का एक लम्बा सफ़र रहा है. वर्तमान दलित आन्दोलन ने भी भारत की निचली जातियों को  'शिक्षित बनो, संघर्ष करो' की प्रेरणा दी और इनके आत्मसम्मान को जगाया, लेकिन जाति के सवाल को यह आन्दोलन भी हल नहीं कर पाया. यह दलित आन्दोलन ऐसा कोई भी कार्यक्रम देने में असफल रहा है जो जाति के भौतिक आधार को समाप्त कर इसको जड़ -मूल से मिटा सके.

वर्तमान में तो दलित आन्दोलन जाति की पहचान को समाप्त करने के बजाय जाति की पहचान बनाने पर तुला है. दलित जातिसूचक उपनाम लगाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा है. ब्राह्मणवादी देवताओं और संस्कारों का विकल्प भी कुछ इसी तरह दिया जा रहा है. अर्थात इस देवता की जगह दूसरा हमारा देवता, इस ग्रन्थ की जगह हमारा फलां ग्रन्थ और स्वयं को स्वयं ही सामर्थ्य बनाओ. वर्तमान दलित आन्दोलन में अलग- अलग तरह के रुझान दिखाई दे रहे हैं. इसके अलावा वैश्वीकरण, निजीकरण का विरोध करने के बजाये यह उसका समर्थन कर रहा है, जिससे निजीकरण निरंतर आरक्षण को समाप्ति की ओर ले जा रहा है और निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग पर ही दलित आन्दोलन ने खुद को सीमित कर लिया है.  
दूसरी तरफ सत्ता में भागीदारी हो जाने पर तमाम दलित पार्टियाँ और नेता दलित समुदाय के उत्थान के कार्य न करके शोषणकारी, दमनकारी राज्यसत्ता के पक्ष में उसके औजार के रूप में कार्य करते हैं. दलित विरोधी नीतियों के पक्ष में अपना वोट विधानसभाओं एवं संसद में डालते हैं. ये लोग अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपनी चल -अचल सम्पति में बढ़ोतरी के आलावा कुछ नहीं करते हैं. एक तरफ दलित समुदाय के बहुसंख्यक हिस्से के पास रोटी, कपड़ा व मकान की भी ठीक से व्यवस्था नहीं है और दूसरी तरफ कई दलित नेता अरबों-खरबों रुपयों में खेलते हैं. उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की घोषित सम्पति जिसका खुलासा उन्होंने पिछले दिनों राज्यसभा के नामांकन के दौरान हलफनामे में किया. यह 112 करोड़ रुपये है. दूसरे दलित नेता भी एक से बढ़कर एक हैं. चाहे वह रामविलास पासवान हों या कोई अन्य, सभी ने सत्ता में भागीदारी के नाम पर यहाँ के पूंजीपति शासक वर्ग की सेवा की और अपनी चल -अचल सम्पति में बढ़ोतरी की. 
भारत में जातिप्रथा वैदिक काल से प्रारम्भ होकर उत्तरवैदिक काल (लगभग 1000-600 ईसापूर्व ) 3000 वर्ष पूर्व तक काफी हद तक अपना स्वरूप ग्रहण कर चुकी थी. सामंतवाद में बदलने के बाद जातिप्रथा ने और भी ज्यादा मजबूती ग्रहण की. चन्द्रगुप्त मौर्य काल में मनु ने 'मनुस्मृति'  की रचना कर जातिप्रथा को एक व्यवस्थित और वैधानिक रूप दे दिया. समाज में मौजूद जातियों के कर्तव्य एवं अधिकार सुनिश्चित कर दिए गये. ब्राह्मणों को शिक्षा-दीक्षा का कार्य, क्षत्रिय (राजा) को जातिप्रथा के नियमों की सुरक्षा करना और उल्लंघन होने पर दण्डित करना. वैश्य को व्यापार और निचली (शूद्र) जातियों को कृषि क्षेत्र, अन्य उत्पादन के कार्यों एवं ऊपरी सभी जातियों की सेवा करने का कार्य निर्धारित किया गया. उत्तरवैदिक काल के बाद जैसे -जैसे सामंती व्यवस्था और ज्यादा विकसित होती गयी, जातिप्रथा का विस्तार और नियम भी भारतीय उत्पादन प्रणाली के साथ -साथ सामाजिक संस्कारों में निरंतर अपनी जड़ों को गहरा करते चले गये. 
भारत में जो भी विदेशी आक्रमणकारी आये और उन्होंने जितने समय तक यहाँ पर शासन किया जाति व्यवस्था को स्वयं ही अपना लिया. एक तरह से वे उसी में रच -बस गये. केवल ब्रिटिश ही इसका अपवाद रहे. क्योंकि वे भारत की तुलना में काफी उन्नत संस्कृति के लोग थे,  इसलिए यहाँ की जातिप्रथा में तो रचे -बसे नहीं. लेकिन इसको तोड़ने का कार्य भी उन्होंने नहीं किया, बल्कि जाति को इस्तेमाल ही किया. 
ब्रिटिश शासकों के भारत से जाने यानी आज़ादी के बाद वर्ष 1947 में यहाँ के शासक वर्ग  ने सामंती व्यवस्था के साथ समझौता कर जाति व्यवस्था को जानबूझ कर बनाये रखा. उसका वोट बैंक के रूप में खूब इस्तेमाल किया गया. जातिप्रथा के भौतिक आधार कृषि की जमीन को पूर्व सामंती समाज में हुए जाति पर आधारित जमीन के बटवारे को ही बरकरार रखा. यानि कोई भी क्रान्तिकारी भूमि सुधार नहीं किया गया, जिसके चलते सामंतवाद से पूंजीवादी जनतंत्र के रूपांतरण काल में भी जातिप्रथा मजबूती के साथ बनी रही. तमाम संसाधनों से वंचित दलित समुदाय मजदूर में तब्दील हो गया और ऊपरी जातियां सभी संसाधनों की मालिक बन बैठीं. सम्पूर्ण व्यवस्था के संस्थानों में भी उच्च जातियां शीर्ष पर जा बैठी. परिणामस्वरूप आज भी जातिप्रथा भारत की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में मजबूती के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज किये हुए है. 
भारत में दलित मुक्ति के सवाल पर ही देशी -विदेशी सरकारों द्वारा अरबों रुपयों की फंडिंग की जा रही है. इस मुल्क के दलित समुदाय का ही एक बुद्धिजीवी तबका दलितों की भलाई व दलित मुक्ति के नाम पर मालामाल हो रहा है. इस तरह वह भी अपनी निजी सम्पति में इजाफा कर रहा है. इस मुल्क का दलित समुदाय वहीं का वहीं है. जैसा कि पूंजीवादी, साम्राज्यवादी राज्यसत्ताएं चाहती हैं कि क्रांतिकारी जनांदोलनों को रोकने के लिए जनता के उत्पीड़ित तबके पर ठन्डे पानी के छींटे मारे जाएँ, वही कार्य ये स्वयंसेवी संस्थायें कर रही हैं. दलित मुक्ति के लिए कार्यक्रम बनाना इनका मकसद नहीं है. यह पूंजीवाद, साम्राज्यवाद के भाड़े के टट्टू हैं. एक सच्चा क्रांतिकारी जाति विरोधी जनआन्दोलन ही इनका भी जवाब हो सकता है. 
सरकारी रिकार्ड के मुताबिक बाईस हजार एनजीओ को वर्ष 2009 -10 के दौरान विदेशों से 10 हजार करोड़ की रकम मिली. इन संगठनों  में 18 एनजीओ तमिलनाडु से सम्बंधित हैं, जिन्हें 1663.31 करोड़ रुपये अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, ईटली और नीदरलैंड जैसे देशों से मिले. 21508 एनजीओ को 10337.59 करोड़ रुपयों की फंडिंग मिली है. केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे ज्यादा विदेशी रकम 1815.19 करोड़ रुपये दिल्ली के एनजीओ को मिले. इसके बाद तमिलनाडु को 1663.31 करोड़ और आंध्र प्रदेश को 1324.87 करोड़ रुपये मिले. जिन जिलों में सबसे ज्यादा विदेशी फंड मिला, उनमें चेन्नई को 871.60 करोड़, बंगलुरु को 702.43 करोड़ और मुंबई को 606. 63 करोड़ रुपये मिले.   
पिछले तीन सालों यानी 2007-2010 के आंकड़ों के मुताबिक एनजीओ को सबसे ज्यादा फंड अमेरिका से मिला. फंडिंग के तौर पर विदेशों से रकम भेजने वालों में सबसे ऊपर गोस्पेल फॉर एशिया इंक 232.71 करोड़ रुपये इसके बाद फ़दाकिओन वीसेट फेरेर, वर्सिलोना, स्पेन 228.60 करोड़ रुपये शामिल हैं. अमेरिका का वर्ल्ड विजन ग्लोबल सेंटर ने एनजीओ को 197.62 करोड़ रुपये दिए. इस विदेशी फंडिंग में अच्छा -खासा हिस्सा दलित मुक्ति के प्रश्न का भी इसी में निहित है. सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, ट्रस्ट एक्ट आदि के तहत 20 लाख से ज्यादा एनजीओ पंजीकृत  हैं.   
भारत का वामपंथी क्रांतिकारी आन्दोलन भी 70 वर्षों के पुराने इतिहास के बावजूद जाति के सवाल को हल नहीं कर पाया है. वर्गीय संगठनों की लामबंदी के साथ आज आवश्यकता इस बात की है कि जाति के खिलाफ संघर्ष को भी वर्ग संघर्ष का हिस्सा बनाया जाये. दलितों के व्यापक हिस्से की गोलबंदी की जाये और एक ऐसा कार्यक्रम बनना चाहिए जो भारत में जातिप्रथा की कब्र खोद सके, जिससे कि वर्गीय संगठनों के साथ तालमेल करता हुआ यह आन्दोलन भारत में जातिविहीन, वर्गविहीन समाज के निर्माण की दिशा में अपना महत्वपूर्ण योगदान कर सके. भारत का वामपंथी क्रांतिकारी आन्दोलन ही इस सवाल को गंभीरता से हल कर सकता है और भविष्य में जाति विरोधी आन्दोलन को आगे ले जा सकता है.
(यह लेखक के अपने विचार हैं. लेखक जेपी नरेला जाति विरोधी संगठन के संयोजक हैं.)
साभारः जनज्वार

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