Tuesday, April 3, 2012

दलित उद्यमिता का संकल्प


महाराष्ट्र के सांगली से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर कावधे महान्का ताल्लुका में देवानंद लोंधे का हिंगन गांव है. वह लंबे समय तक अपने गांव से बाहर रहे. कई वर्षों तक देश से भी बाहर रहे. अच्छी नौकरी थी, लेकिन उसके बावजूद दिल में तड़प हमेशा अपने गांव लौटने की बनी रही. अपने गांव के बेरोज़गार परिवारों को रोज़गार कैसे मुहैया कराया जाए, वह हमेशा यही सोचते रहे. जब परिवार में पैसा आता है तो उसका जीवन स्तर सुधरता है, बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलती है. जिस गांव में बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलेगी, उस गांव की उन्नति को कोई रोक नहीं सकता. यह लोंधे की कल्पना थी, उस समय, जब वह विद्यार्थी जीवन में थे. 


समय बीता और महज़ दो साल पहले इसी गांव में लोंधे ने अपनी दस्ताने की एक यूनिट लगाई. जहां उनकी दस्ताने की यूनिट है, पहले वहां कपड़े का एक कारखाना हुआ करता था, जो बाद में बंद हो गया. इस पचास हज़ार स्न्वायर फीट ज़मीन को देवानंद ने ख़रीद तो लिया, लेकिन उस समय तक वह यह तय नहीं कर पाए थे कि गांव में ली गई इस ज़मीन को कैसे इस्तेमाल करना है. कपड़े का कारखाना बंद होने के बाद गांव की अर्थव्यवस्था निश्चित रूप से प्रभावित हुई थी. इसलिए लोंधे ने ज़मीन लेने के साथ ही यह तय कर लिया कि वह कोई ऐसा काम करेंगे, जिसमें उन्हें मुना़फा भले ही कम मिले, लेकिन उससे गांव के अधिक से अधिक लोगों को रोज़गार मिलना चाहिए.


चूंकि देवानंद लोंधे एक दलित परिवार से संबंध रखते हैं, इसलिए उन्होंने अपने आसपास भेदभाव और ग़रीबी को क़रीब से देखा है. लोंधे के शब्दों में, दलितों के साथ होने वाले भेदभाव का एक ही हल है कि उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाया जाए. उनकी उपेक्षा दलित होने की वजह से कम ग़रीबी की वजह से अधिक होती है. लोंधे मानते हैं कि समाज में अब उनके साथ भेदभाव नहीं है. यदि कोई करने की सोचे तो उसे संयम के साथ सही जवाब देने में वह भी सक्षम हैं. अधिक से अधिक गांव वालों को अपने साथ जोड़ने की मंशा लेकर हिंगन गांव में पायोद इंडस्ट्रीज बनी. हाथों के लिए दस्ताने का काम शुरू हुआ. मशीनें चीन से लाई गईं. मशीनें लाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि उनसे कम से कम काम करना पड़े, अधिक से अधिक काम हाथों से हो. इस तरह गांव में एक साथ डेढ़ सौ लोगों के लिए रोज़गार की व्यवस्था पायोद इंडस्ट्रीज की वजह से हुई. इसमें स़िर्फ पांच फीसदी पुरुष रखे गए, बाक़ी सभी काम महिलाएं देखती हैं.


इसके पीछे भी लोंधे की दूरदर्शिता काम कर रही थी. उनके अनुसार, पुरुष का पैसा स़िर्फ पुरुष के लिए होता है. उस पर मालिकाना हक पुरुष का होता है, लेकिन महिलाओं के हाथ में जो पैसा आता है, वह पूरे परिवार का होता है. पुरुष के हाथ के पैसे का अधिक भाग खाने-पीने जैसी चीजों पर ख़र्च होता है, जबकि महिलाएं बच्चों की शिक्षा और उनके स्वास्थ्य की भी अधिक चिंता करती हैं. लोंधे द्वारा बनाए गए विशेष प्रकार के दस्तानों की सौ फीसदी आपूर्ति विदेशों के लिए होती है. इन दस्तानों की मांग जापान एवं चीन में अधिक है. सौ फीसदी निर्यात की वजह से उन्हें बैंक से ॠण लेने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. चूंकि उनके सारे ग्राहक विदेशों में थे और दस्ताने के लिए इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल भी वह बाहर से ही मंगाते हैं. इसी वजह से कोई भी बैंक शुरुआती दौर में उन्हें ॠण देने के लिए तैयार नहीं हुआ. इसके बावजूद उन्होंने अपनी लगन की बदौलत और साथियों की मदद से कंपनी का सालाना कारोबार अस्सी लाख रुपये तक पहुंचा दिया.


बात अगर लोंधे के जीवन की करें तो उन्होंने लंबे समय तक कुछ ग़ैर सरकारी संगठनों और एजेंसियों के साथ काम किया. सुनामी के समय जब स्थानीय लोग शहर छोड़कर भाग रहे थे तो उन्होंने अपना डेरा चेन्नई में जमाया. अ़फग़ानिस्तान से जब लोग भाग रहे थे तो वह अ़फग़ानिस्तान में रहे. कुल मिलाकर उन्होंने इन्हीं अनुभवों से विपरीत परिस्थितियों में जीने और मुस्कराने की कला सीखी है. पायोद में काम करने वाले हर शख्स को पता है कि यहां कोई बड़ा नहीं है और किसी का पद छोटा नहीं है. पायोद परिवार का सदस्य बनाने से पहले हर शख्स को यह घुट्टी घोलकर पिलाई जाती है. यहां सबको बराबरी का दर्जा हासिल है.


[I]साभारः चौथी दुनिया[/I]


http://www.dalitmat.com/index.php/dalit-enterpreneur/1007-dalit-udyamita-ka-sankalp.html

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