Tuesday, April 3, 2012

दलित, हुनर और उसकी कीमत
हमेशा से ये कहा जाता रहा है कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता. ये कहावत आज भी उतनी ही सच्ची साबित होती है जितनी पहिले थी. उदाहरण के लिए प्राचीन काल में नृत्य या अभिनय करने वाले लोगों को बड़ी घृणा कि दृष्टी से देखा जाता था. पर समय के साथ ही जैसे जैसे नृत्य और अभिनय कि कला ने अपनी पहुँच घर घर तक पहुचाई तो इन कलाओं का मूल्यांकन बढ़ गया. इसका असर ये हुआ कि जो नृत्य या अभिनय कुछ चंद कौड़ियों में होता था आज उसके लिए करोड़ों लुटाये जाते हैं. मेरे कहिने का अभिप्राय सिर्फ इतना है कि हमारा समाज विभिन्न कलाओं का जन्मदाता है पर हम समय के साथ उन कलाओं का स्तर नहीं उठा सके जिसके कारण हमारे हुनर कि कीमत नहीं बढ़ सकी और हम सर्व गुण संपन्न होने के बावजूद गरीबी का जीवन जीते रहे हैं. 

आज हमें जरूरत है अपनी उन सभी कलाओं और हुनर को और ज्यादा निखारने का, उनको विश्व स्तर पर पहुँचाने का. ये काम हमारे समाज के सभी लोग भले ही न कर सकें लेकिन हमारे समाज के धनाड्य वर्ग का ये कर्त्तव्य बनता है कि वे अपनी व्यस्त जिंदगी में से कुछ समय निकाल कर अपने उन गरीब साथियों कि मदद कर सकते हैं जो उतने सक्षम नहीं हैं. मैं अपने साथ कुछ ऐसे ही साथियों का सहयोग चाहता हूँ जो  इन विचारों से सहमत हैं. मैं एक ऐसा स्वयमसेवी संगठन बनाना चाहता हूँ जो स्व पोषित हो और निःस्वार्थ भाव के साथ गठित हो. इस संगठन का कोई राजनीतिकरण न हो और न ही हम किसी जाति या धर्म विशेष के विरुध्द न हो. मेरा उद्देश्य अपने समाज को सिर्फ आगे ले जाना है बिना किसी का विरोध किये. संभव है कि ये बात किसी को शायद पसंद ना आये पर हमें अपने बाबा साहेब अम्बेडकर के इन्ही वाक्यों को अनुसरित करना है जो उन्होंने सिखाया था. 
"दलित युवाओं को मेरा पैगाम है की एक तो वे शिक्षा और बुद्धि में किसी से कम न रहें, दुसरे एशो-आराम में न पड़कर समाज नेतृत्व करें. तीसरे, समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी संभालें तथा समाज को जागृत और संगठित कर उसकी सच्ची सेवा करें."
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                                                                                                                     ---------------- ब्लॉग लेखक 

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