Sunday, May 6, 2012


दलित युवाओं की समस्याएं एवं कुछ सम्भव सुझाव  

आज की पीढ़ी में ज्यादातर दलित युवा थोड़े बहुत साक्षर हैं. पर उनके साक्षर होने की क्षमता का अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है की वो सिर्फ अपना नाम ही सही तरीके से लिख लें तो बहुत है. मैं उनके आत्म सम्मान को तोड़ नहीं रहा बल्कि उनकी इस हकीकत से उनका साक्षात्कार करना चाहता हूँ. माना जा सकता है की कुछ युवा इससे भी ज्यादा शिक्षित हों पर क्या वे उस शिक्षा का सही उपयोग कर पाते हैं. मेरे विचार से तो नहीं. ज्यादातर को तो ये तक पता नहीं होता कि कौन सी व्यावसायिक शिक्षा उनको फायदा दे सकती है या उनको दी जाने वाली सरकारी सहायता को वो कैसे पा सकते हैं. ये तो बात थी उस दलित वर्ग कि जो गरीबी कि रेखा से बहुत नीचे अपना जीवन व्यतीत कर रहे है. पर वो दलित युवा जो थोड़े बहुत सक्षम एवं शिक्षित हैं क्या वो भी अपने लक्ष्य को पा पाने में समर्थ हैं. नहीं! बिल्कुल नहीं. आज के समाज में एक नौकरी करने वाला शिक्षित दलित युवा अभी भी अपनी नौकरी या व्यवसाय में बहुत नीचे काम कर रहा है. क्या वो वाकई इस प्रोन्नति के लायक नहीं हैनहीं वो लायक तो है पर जब वो कठिन परिश्रम करके फल की उम्मीद करता है तो उसे निराशा ही हाथ लगती है. कारण ये है कि साथ में काम करने वाले साथी ज्यादातर उच्च वर्ग से सम्बंधित होते हैं और वे कतई ये नहीं चाहते कि ये निम्न वर्ग का व्यक्ति उनके समकक्ष आये. जब साक्षात्कार में बैठे लोग इमानदार न होकर जातिवादी व्यवस्था को सलाम करेंगे तो बेचारे इस दलित युवा का क्या होगाक्या उसका मन निराशा से नहीं भर जाता होगा. 

आज भी सवर्ण लोग ये दलील देते हैं कि इतने वर्ष आरक्षण के वावजूद दलित उनके समकक्ष नहीं आ सके. क्या ये कहना उनको शोभा देता हैदलित और सवर्ण क्षमता की ये तुलना क्या न्यायसंगत हैएक तरफ सवर्ण सभी संसाधनों से लैस हैंउनके हजारों रिश्तेदार ऊँचे पदों पर बैठे हैंउनके पास पुश्तैनी जमीन जायदाद है जिसके दम पर वे आज तक इतराते हैं और दूसरी तरफ हमारे दलित युवा हैं जो धन के आभाव में बड़ी मुश्किल से पढ़ पाते हैं और पढने के बाद परिवार की जरूरतों का बोझ तुरंत उन पर आ जाता है. एक भूंखा पेट या तो अपनी क्षुधा बुझाये या फिर अपने अधिकार के लिए संघर्ष करे. ये एक ऐसा प्रश्न है जहाँ हमारे युवा अपने परिवार को चुनते हैं और परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने भविष्य से मुख मोड़ लेते हैं. इसे उसकी मजबूरी समझे या उसका त्याग पर सच तो यही हैं कि इन सब में वो अपना अस्तित्व खो देता हैं. 
इस पूरे संवाद का मकसद आपको सिर्फ ये अवगत करना है कि अपने दलित समाज के हितों कि रक्षा और उसके संवर्धन के लिए हम सभी को एक होना होगा. एक होने से मतलब ये है कि  हमें ये प्रण लेना चाहिए कि अपने सामने दलित भाई पर होने वाले किसी भी अन्याय को हम बर्दास्त नहीं करेंगे. उसका पूरा विरोध करेंगे जो हमें आगे बढ़ने में बाधक बनता है. जिस दिन सभी दलित वर्ग एक सुर में सुर मिला कर हुंकार भरेगा, उस दिन किसी दलित के हक़ को कोई नहीं हड़प सकेगा. 

"दलित जागरण" अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेगा अपने दलित भाइयों को सही मार्गदर्शन प्रदान करने की. इसी धारणा के अनुसार, हम आ चुके हैं एक नयी वेबसाइट पर जो विशेष इनही उदेश्यों के लिए बनी है कृपया इसे अपना सहयोग जरूर दे अपने जानने वाले हर दलित युवा को अवगत करा कर. log in करें on "www.dalitjagran.com". जल्द ही हम इसके लिए मोबाइल alerts लेकर आयेंगे जिससे ग्रामीण भाई भी इसका उपयोग कर सकें.                                                                            --- जय भीम                                                                                                 

1 comment:

  1. sahi kah rahe ho bhai. ye to hakikat hai. hamen ise samajhna hi hoga tabhi hum aage badh sakenge.

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