Saturday, May 12, 2012


भीम वंदना : परिचय एक दलित का दूसरे दलित से 
प्राचीनकाल से ही दलितों की उपेक्षा उच्चवर्णीय समाज के लोगों ने की पर क्या एक दलित ने दूसरे दलित की पीड़ा को समझा? क्या वो एक दूसरे के निकट आये? क्या उन्होंने अपने को एक दूसरे से जोड़ने का प्रयास किया? मेरे विचार से तो शायद नहीं या फिर ये कहें कि जितना भी किया वो काफी कम था. ऐसा शायद इसलिए भी था कि वो एकता के प्रभाव से अनभिज्ञ रहे हैं. सच्चे ह्रदय वाले और स्वाभिमानी लोग रहे हैं दलित. उन्होंने किसी के अधिकारों में कभी हस्तक्षेप नहीं किया बावजूद इसके कि उनको पीड़ा देने में सवर्णों ने कोई कमीं नहीं की. आज जब दलित युवा अपने वजूद को तलाश रहे हैं क्या ये हम सब दलितों की जिम्मेदारी नहीं बनती कि हम उनका मार्ग प्रशस्त करें. और ये सब हम तभी कर सकेंगे जब हम सब एकजुट होंगे. 
मेरे विचार से इसके कई उपाय हैं जैसे हमें अपने उत्सवों को बढ़ाना चाहिए. एक जगह मिलने के बहाने तलाशने होंगे ताकि हम अपनी जनशक्ति को जान सकें, एक दूसरे के विचारों को समझ सकें, एक दूसरे के दर्द में उनका साथ दे सकें. लगभग सभी दलित भाई "डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी" के समर्थक हैं तो फिर क्या हमें साप्ताहिक या मासिक रूप से सम्मलित होकर "भीम वंदना" नहीं करनी चाहिए? वो व्यक्ति जो दलित समाज को उसके अधिकारों कों दिलाने के लिए जीवन भर संघर्षरत रहा क्या वो हमारी आराधना का अधिकारी नहीं है? बिल्कुल है. हम राम या कृष्ण को तो पूजतें हैं जिनके होने या न होने का कोई प्रमाण न तो सवर्णों के पास है, और ना ही विज्ञानं के पास. पर जिनके जीवन का प्रमाण हमारे पास है और जिनके संघर्षपूर्ण जीवन से हम सब परिचित हैं क्या हमें उन्हें अपने पूज्य का दर्जा नहीं देना चाहिए. मेरे विचार से तो हर दलित का एक ही पूज्य होना चाहिए और वो अपने बाबा साहेब हैं. 
"भीम वंदना" का उद्देश्य सिर्फ अपने बाबा साहेब जी की पूजा नहीं है बल्कि इन समारोहों द्वारा एक दूसरे से मिलना और एक दूसरे को जानना भी है. हम आज महंगाई के उस ज़माने में खड़ें हैं जहाँ किसी व्यक्ति को इतनी फुर्सत नहीं कि वो अपने बगल के घर में झांक कर ये भी देख सके कि उसका पडोसी बीमार या दुखी तो नहीं. इस ज़माने में अगर गरीब दलित वर्ग एक जुट हो कर नहीं रहेगा तो उसे बिखरते देर नहीं लगेगी. सिर्फ अपने लिए दो वक्त का भोजन जुटा लेना ही जीवन नहीं है ये हम सभी को जानना ही होगा, जिससे हम अपने जीवन स्तर को उठा सकें. अगर हम सिख धर्म के लोगों को देखें तो शायद वो हम उनसे कुछ सीख सकें. वो अपने गुरुद्वारों के माध्यम से एक दूसरे से हमेशा जुड़े रहते हैं इसलिए संख्या में कम होने पर भी वो सक्षम हैं. वो अपने हर गरीब भाई की मदद को हमेशा तत्पर रहते हैं. ये उनकी कुछ गुण है जो हमें भी अपने अन्दर ग्रहण करने चाहिए. अगर हम एक दूसरे से जुड़ने में कामयाब होते हैं तो अपनी परेशानियों और दुखों को दूर करने में हमें ज्यादा समय नहीं लगेगा. आशा करता हूँ की मेरा दलित समाज मेरी इस बात पर गौर जरूर करेगा.              -- जय भीम  

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