Tuesday, May 22, 2012

राजनीती में पूंजीकरण और दलितों का भविष्य 
भारत की आजादी के कुछ साल बाद जब संविधान लागू हो गया और चुनावों की शुरुआत हुई तो दबंगों ने चुनावी क्षेत्रों के पोलिंग बूथों पर कब्ज़ा किया और चुनावों पर आसानी से विजय पायी. आज आजादी के इतने समय बाद भी भारतीय चुनाव एक अनबूझ पहेली हैं. कहने के लिए तो ये चुनाव पूर्ण सुरक्षा के साथ होते हैं और गिनती भी निष्पक्ष हो गयी है, पर क्या चुनाव का वास्तविक उद्देश्य पूरा हुआ है? शायद नहीं. आज पूंजी एक बहुत बड़ी शक्ति है  जो किसी भी उम्मीदवार के टिकट पाने और जीतने की कुंजी बन गयी है. किसी भी पार्टी से चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार का पूंजीपति होना आवश्यक हो गया है. आपके मन में देशभक्ति का जज्बा भले न हो लेकिन अगर तिजोरी में धन है तो आप किसी न किसी पार्टी के टिकट से चुनाव लड़ ही सकते हैं. और लड़ ही क्या जीत भी सकते हैं क्योंकि पूंजी है तो गरीब लोगों को बहकाना क्या मुश्किल है. राजनीतिक पार्टियाँ भी अपने जीतने के प्रतिशत को बढ़ने के लिए किसी भी पूंजीपति को टिकट दे देती हैं, भले ही वो एक अपराधी या हिस्ट्रीशीटर ही क्यों ना रहा हो. 

चुनाव आयोग हमेशा से ही चुनाव सुधारों पर जोर देता रहा है, पर उसे इतनी शक्तियां ही प्रदान नहीं की गयी हैं कि वो अपराधियों और भ्रस्ताचारियों को चुनाव में खड़े होने से रोक सके. वो बेचारा तो बार बार संसद कि तरफ देखता है और ये उम्मीद करता है कि शायद कोई जागरूक सरकार आ कर उसके प्रस्तावित चुनाव संशोधनों पर कोई कानून बनाएगी. पर ये दिवा स्वप्न से कम नहीं है. ये कैसे संभव है जब संसद के अन्दर एक चौथाई अपराधी बैठे हों. वो क्या ऐसा होने देंगे? 
दलित नेता भी इससे अछूते नहीं हैं. दलितों में भी सिर्फ वे ही चुनाव के काबिल समझे जाते हैं जो पार्टी को लाभ दे सकें भले ही वो सरकार आने पर दलितों का पैसा ही लूट लें. दलित उद्धार योजनाओ के नाम पर बहुत सारा धन सरकारी खजाने से निकाला जाता है पर ये दलितों कि भलाई में नहीं लग पाता. कभी क्या हम दलित भाई ये विचार करते हैं कि क्यों आखिर हमारे बीच के नेता ही हमारे लुटेरे हो गए. ये एक साधारण सी बात है. अगर एक पूंजीपति अपना धन चुनाव के समय खर्च करता है तो जीतने के बाद उसका कई सौ गुना कमाने कि इच्छा भी वो रखता है. यही कारण है कि चुनाव एक व्यवसाय जैसा हो गया है. जिससे हम दलितों का धन जो सरकारी खजाने से निकलता तो है पर कहाँ अदृश्य हो जाता है पता नहीं चलता.  

अब प्रश्न ये उठता है कि दलित बेचारा करे भी तो क्या? क्या उसे इन अपराधियों या भ्रस्ताचारियों  में से ही किसी एक को चुनना उसकी मजबूरी है? या कोई अन्य उपाय भी है? उपाय हर समस्या का होता है और इसका भी है. ये समस्या हमसे ही शुरू होती है इसलिए इसका इलाज भी हमारे पास ही है. जरा सा सोचने कि जरूरत है. इन अपराधी या भ्रस्ताचारी उम्मीदवारों की चुनावों में इतनी रूचि क्यों है. वो सिर्फ इसलिए कि मंत्रियों के पास पैसा, पावर और रसूख सब कुछ होता है. पैसा और पॉवर तो अपराधी आसानी से पा सकते हैं पर सरकारी रसूख उनको मंत्री बनने पर ही मिल सकता है. 


अगर हम इन अपराधियों या भ्रस्ताचारियों को चुनावों से दूर करना चाहते हैं तो हमें अपने आप पर और अपने समाज को जागृत करना होगा. कोई गरीब से गरीब दलित भाई भी अपने वोट का उपयोग किसी लालच में ना करें. ऐसे दलित भाइयों को ये समझाएं कि ये दलित समाज के हित में नहीं है और इसके दुस्परिणाम क्या होंगे. गरीब दलित भाई गरीब जरूर होता है पर मंद बुद्धि बिलकुल नहीं. अगर उसे सही तरीके से समझाया जाये तो वो जरूर बातों को समझेगा. हमारे दलित समाज के एकजुट ना होने के कारण गरीब दलित अपने को समाज से अलग थलग महसूस करता है जिसके कारण वो अपनी मजबूरी और थोड़े से लालच को प्राथमिकता दे देता है. अगर हम अपने सभी दलित भाइयों को एक साथ जोड़ने में समर्थ हो गए तो ये राजनीतिक पार्टियाँ ऐसे अपराधी और भ्रस्ताचारियो को टिकट देना बंद कर देंगी. जब उनको महसूस हो जायेगा कि दलित समाज से पैसे के जोर पे कोई वोट नहीं ले सकता तो वो सही प्रतिनिधियों को मौका देंगे और यही सही समय होगा जब हम उन सही प्रत्याशियों को चुन सकें. एक सही और बेदाग प्रत्याशी ही हमारे समाज के हित में काम करेगा. 


मेरा अपना निजी विचार है कि हमें किसी भी प्रत्याशी जो चुनावो में तय सीमा से ज्यादा खर्च करता दिखता है उसे तो कतई वोट नहीं देना चाहिए क्योंकि जो चुनाव आयोग से गद्दारी कर रहा है हो हमें कैसे छोड़ देगा. ये अतिरिक्त धन जो चुनाव में वो खर्च करेगा वो जीतने पर हमारे पैसे से ही वसूल भी करेगा. 


वोट किसे देना चाहिए ये एक निजी अधिकार है इसलिए मैं किसी पार्टी या प्रतिनिधि की बात नहीं करूंगा बल्कि सिर्फ इतना कहूँगा कि सबकुछ चुनाव आयोग की जिम्मेदारी नहीं है, कुछ हमारी जिम्मेदारियां भी हैं जिन्हें हमें जानना चाहिए और एक दूसरे को इससे अवगत भी कराना चाहिए. अगर हम ऐसा करते हैं तो ये अपने दलित समाज की सच्ची सेवा होगी. 

No comments:

Post a Comment

For the comment section there will be no responsibility of Dalit Jagran. It is expected from users to have polite & soft discussion on this blog.