Tuesday, June 19, 2012

न्यायपालिकाएवं पत्रकारिता में आरक्षण जरूरी क्यों?
आरक्षण एक ऐसा शब्द जिसे कभी दलित एवं पिछडों के सामाजिक और राजनीतिक  प्रतिनिधित्वसे जोड़कर पारिभाषित किया था हमारे समाज के महापुरुषों ने, पर क्या आज हम उस मुकाम को हासिल कर पाए हैं जो उन सभी महापुरुषों का सपना था? ये प्रश्न आज भी मेरे अंदर उठता है और शायद आपके भी मन में उठता हो. मैं आज सरकारी विभागों में आरक्षण कि बात नहीं कर रहा (जिसकी बात अगले लेख में करूँगा) बल्कि संविधान के दो प्रमुख स्तंभों न्यायपालिकाएवं पत्रकारिता के बारे में बात कर रहा हूँ जिसमें दलितों और पिछडों के लिए पर्याप्त आरक्षण (माफ कीजियेगा कहना चाहिए प्रतिनिधित्व) का प्रावधान अभी तक नहीं हो पाया है. आज भी हमारे समाज का प्रतिनिधित्व इन क्षेत्रों में बहुत कम है. इसके तमाम कारण, जो आज तक मैंने सुने या पढ़े हैं उनमें ज्यादातर यही कहा गया है कि इन क्षेत्रों में आने वाले दलितों एवं पिछडों में पर्याप्त योग्यता नहीं है. क्या ये पूरा सच है या फिर हमारे समाज को आगे बढ़ने से रोकने के लिए किया गया कोई षड़यंत्र? इसका उत्तर तो भविष्य के गर्भ में है पर जो तथ्य हमारे सामने हैं मैं उनकी तरफ आप सभी का ध्यान जरूर आकर्षित करना चाहूँगा. पिछले लेख में मैंने बहुत से दलित और पिछड़े वर्ग के सक्षम एवं विद्वान लोगों का एक सारांश इन्टरनेट से निकला था. ये सारांश अगर दलितों एवं पिछडों कि योग्यता को प्रमाणित नहीं करता तो ये कम भी नहीं हैं इस बात का अहसास दिलाने के लिए कि दलित एवं पिछड़े वर्ग के लोग अब पर्याप्त योग्य हैं इन क्षेत्रों में अपनी भूमिका निभाने के लिए.

दलितों एवं पिछडों की इन क्षेत्रों में भागेदारी न के बराबर होना ये दर्शाता है कि कहीं न कहीं दलितों और पिछडों की इन क्षेत्रों में भागेदारी का मार्ग अवरुद्ध हो रहा है (या किया जा रहा है). मैं किसी व्यक्ति या समाज विशेष को इसका दोष नहीं दे रहा बल्कि भारतीय समाज के सभी अंगों को ये अवगत कराना चाहता हूँ कि भले ही वो कोई भी तर्क दें पर ये प्रत्यक्ष सत्य है कि बिना दलितों एवं पिछडों को साथ लिए भारतीय संविधान के तीनों स्तंभ अधूरे हैं और रहेंगे.

सवर्णों कि कथनी और करनी पर बड़ा अफ़सोस होता है जब मैं ये देखता हूँ कि एक तरफ तो वे  घोषित आरक्षण (सरकारी) का विरोध करते हैं पर उसके साथ ही अपने हर कार्यक्षेत्र (प्राइवेट) में उन्होंने एक अघोषित ९५% का आरक्षण लागू कर रखा है. जिसमें हमारे दलित व पिछडों के बच्चे पीछे रह जाते हैं और उनके पास सिर्फ सरकारी आरक्षण का ही एक सहारा रह जाता है. बड़ी बात ये है कि प्राइवेट संस्थानों एवं उद्यमों में ९५% से ज्यादा का अघोषित आरक्षण की बात वो कभी करना नहीं चाहते बल्कि हमारे दलित एवं पिछड़े वर्ग के गरीबों के कुछ एक खुले रास्तों को भी बंद करना चाहते हैं. क्या यहीं हमारे संविधान का उद्देश्य है?

आज भी इन दो क्षेत्रों में पर्याप्त भागेदारी न होने से पीडितों पर होने वाले अत्याचार ना तो पूरी तरह से सामने आ पाते हैं और कोर्ट में भी उनके ऊपर होने वाले अत्याचारों को प्रमाणित नहीं किया जा पाता है. ध्यान रखे ये हाईकोर्ट एवं लोवर कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए नियम विधान सभा से पारित होते हैं जिसके लिए राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं. अगर आप दलितों एवं पिछडों की इन दो क्षेत्रों में भागेदारी के लिए सहमत हैं तो जब भी राज्यों के चुनाव हों तो ये मुद्दे अपने प्रत्याशियों के सामने रखें और उनसे ये आश्वाशन लें कि उनकी सरकार दलितों एवं पिछडों के लिए इन क्षेत्रों में आरक्षण का प्रावधान जरूर करेगी. चर्चा करें और ये बातें अपने समाज को जरूर बताये जिससे अपना समाज सुरक्षित एवं सक्षम हो सके.  


                             ---- जय भीम

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